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दारोगा जी का बुलावा

Posted On: 11 Jul, 2016 में

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हमारे पडोस में एक बुजुर्ग रहा करते थे। वे कहा करते थे कि सबसे सकून की जिन्दगी उस आदमी की होती है जिसने कभी अस्पताल‚कचहरी‚ और थाने का मुंह न देखा हो। लेकिन आज जिन्दगी में इन तीनों का मुंह सभी को किन्ही न किन्ही परीस्थितियों में देखना ही पडा होगा। क्या आपका भी पाला इन तीनों से पडा है‚ इसका उत्तर ʺ न ʺ तो नहीं ही होगा। होगा भी कैसे । यह जो माया नगरी है यहां पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तर्ज पर ʺ ज्ञान ʺ बांटने वाले बहुत मिलेगे।
यहां हम चर्चा करने जा रहे हैं उपर्युक्त तीनों पायदानों में एक थाने की। वैसे तो थाने के पायदान पर पहले या बाद में पहुंचने से मतलब नही है। कभी न भी एक के बाद दूसरे के यहां पहुंचना ही पडता है। हां इनके यहां पहुंचने के क्रम में परिवर्तन हो सकता है।आइये देखते हें कि थाने पर पहुंचने की परीस्थितियां क्या हैं और यहां के राजा अर्थात् ʺदारोगाʺ जी की इस मामले में क्या भूमिका हो सकती है। हमने यहां दारोगा जी को राजा इसलिए कहा कि ये महाशय अपने क्षेत्र के राजा के समान ही होते है। इस संदर्भ में एक घटना की चर्चा करना समीचीन समझते हैं। एक गांव में एक समय किसी जिले के कलक्टर अब के ʺजिलाधिकारीʺ महोदय अपनी नियमित जांच कार्यवाही के सिलसिले में पहुंचे । वहां एक बूढी औरत किसी समस्या को लेकर काफी दिनों से परेशान थी। येन केन प्रकारेण वह और कलक्टर साहब के सामने पहुंच गयी और अपना दुखडा रोया। कलक्टर साहब रहमदिल और न्यायप्रिय इंसान थे। उन्हे यह समझ में आ गया कि बुढिया की समस्या न्यायोचित और गंभीर है । उन्होने अपने साथ गये मातहत अधिकारियेां को बुढिया की समस्या का समाधान न करने पर डांट पिलाई और तुरंत समस्या का समाधान करने को कहा। बुढिया को क्या चाहिए जिसे वह वर्षो से नहीं सुलझा पायी उसे कलक्टर साहब मे एक मिनट मे सुलझा दिया। बुढिया इतनी प्रसन्न हुयी कि उसने कलक्टर को आशीर्वाद दिया कि ʺ बचवा जाओं दारोगा बन जाओेʺ। वहां उपस्थिति बुद्धिमान लोग हंस पडे। लेकिन कलक्टर साहब चुपचाप वहां से चले गये। वास्तव मे बुढिया के लिए उस समय और परीस्थितियेां में वहां का दारोगा की राजा और सब कुछ था। इसी प्रकार के दारोगा जी और उनकी कार्यप्रणाली की चर्चा हम यहां करना चाहते हैं।
जब कोई परीस्थितियों से सताया आदमी किसी अधिकारी के यहां अपनी समस्या के समााधान के लिए कोई प्रार्थना पत्र देता है तो कथित ʺ जांचʺ के लिए उसके प्रार्थना पत्र को संबंधित थाने पर आवश्यक कार्यवाही और आख्या के लिए भेज दिया जाता है। यह प्रार्थना पत्र कोई पीडित व्यकित भी देता है और कोइ्र पीडा पहुंचाने वाला भी दे सकता है। जब प्रार्थना पत्र या शिकायती पत्र थाने पहुंचता है तो फिर खेल शुरू होता है। कथित ʺजांचʺ का। दारोगा जी पहले तो प्रार्थना पत्र को हफ्तो ओर कभी कभी महीनो लटकाये रहते हैं और इंतजार करते हैं कि संबंधित पक्षकार स्वयं उस प्रार्थना पत्र की पैरवी करने उनके यहां आ जाय और फिर वह अपने ढंग से उसकी ʺजांचʺ करें। यह जांच कई प्रकार की हो सकती है। जैसे दूसरे पक्षकार का पक्ष भी लेना है। या फिर कागजात देखना है। आदि आदि।
लेकिन जब कोइ्र पक्षकार थाने नहींं पहुंचता ओर पीडित पक्ष की कोई सुनवाई या जांच नहीं होती तो पीडित पक्ष पुनः उच्चअधिकारियों के यहां दस्तक देता है। ओर यही दस्तक देना ही उसके जी का जंजाल हो जाता है। और वह बैठे बिठाये ʺआ बैल मुझे मारʺ की कहावत को चरितार्थ कर बैठता है। दारोगा जी का पारा सांतवे आसमान पर पहुंच जाता है और धडघडाते हुये अपनी वर्दी का रोब दिखाने पहुंच जाते है उस पीडित आदमी के यहां के यहां जो पहले से ही पीडित है। तमाम तरह की उल जूलूल की बाते कुछ गालियां कुछ धमकियां और फिर कुछ कागजातों की देखादेखी । फिर भी मन का गुबार नहीं भरता और फरमान सुनाया जाता है ʺसभी कागजात लेकर थाने आवो।ʺ। पीडित पक्ष अवाक् । उसे समझ में नहीं आता कि जब मैने सारे कागजात दिखा दिये सारे सबूत दे दिये तो फिर थाने जाने का क्या मतलब हो सकता है। एसा ही कुछ दूसरे पक्षकार के साथ भी दारोगा जी करते और कहते हैं।
अब बारी आती है थाने जाने और न जाने की । अगर समस्या गंभीर है और पक्षकार दूसरे पक्ष से काफी पीडित है तो उसे दारोगा का निमंत्रण कबूल करना ही होगा। वह अगर थाने और कचहरी का चक्क्कर लगाने का आदी या अभ्यस्त है तब तो वह अपने सारे वही कागजात जिसे अपने यहां जांच की प्रकिया मे दारोगा जी दिखा चुका होता है लेकर थाने पहुंच जाता है । और अगर वहां जाने का अभ्यस्त नहीं है और सीधा साधा है तो उसे थाने ओर पुलिस के नाम से भी कंपकंपी होने लगती है। जब वह अपने यहां दारोगा जी की बंदरधुडकियों का सामना नहीे कर सकता तो फिर शेर की मांद अर्थात थाने मे किस प्रकार से करेगा। वह एसे मे अपने स्वयं के प्रभाव या परिचय का आंकलन करता है और किसी एसे आदमी की तलाश करता है जिसका दारोगा जी से भी काफी रब्त जब्त होता है। यही बात कमोबेश उक्त दूसरे पक्षकार की भी हो सकती है। दोनो स्वयं के या अपने किसी परीचित के माध्यम से दारोगा जी के यहां पहुंचते है। और वहां फिर से उन सभी कागजातो का पोस्टमार्टम शुरू हो जाता है जो दारोगा जी अपनी पहली जांच के दौरान पीडित पक्ष के घर पर कर चुके होते हैं। इस पोस्टमार्टम के बाद एक बार फिर शुरू होता है धंमकियों आदि का सिलसिला ओर ʺउठा कर बंद कर दूंगाʺ की धमकियां। घबराया पीडित कातर निगाहो से अपने साथ आये शुभचिंतक‚या फिर दलाल या फिर जो चाहे कह लीजिए उसकी ओर इस आशा से कि वहीं उसका पालन हार और वैतरी से पार निकलवायेगा। फिर अगर कुछ लेन देन के बाद मामला तय हो गया तो ठीक नहीं तो फिर दंड प्रकिया संहिता की धारा 151 तो है ही पुलिस का बंहमास्त्र। वही इसका प्रयोग थाने मे ही कर देता है । और घटना को मौके पर हुयी वारदात बता कर एक चालान काट देता है और पक्षकारों को कम से कम छः महीनेां के लिए अदालतो का चक्कर काटने का इंतजाम कर देता है और हमारे गांव के बुजुर्ग द्वारा बताये गये दो शर्तो अदालत और थाने के जिक्र का माकूल जबाब दे देता है।
अब अगर दोनों पक्षकारों में दबाव और लेन देन के बाद मामला निपटा दिया जाता है तो फिर इस आंशका मे कहीं फिर से कोई पक्षकार अधिकारियेां के दरवाजे पर दस्तक न दे दे और उसे बैठे बिठाये उनके कोप का भाजन न बनना पडे दंड प्रकिया संहिता की धारा 107/116 के तहत पाबंद करने की आख्या अपने अधिकारी के पास भेज देता है। और उन पक्षकारों को कम अपने को ज्यादा सुरक्षित और संरक्ष्‍िात कर लेता है।
इस प्रकार से दारोगा जी की जांच प्रकिया पूरी हो जाती है और जनता इसी प्रकार से कथित जांच की काय्रवाही से दो चार होती रहती है। शासन और प्रशासन तथा नेता आये दिन समारोहो मे यह भाषण देने से नहीं चूंकते कि पुलिस को जनता का मित्र होना चाहिए। आदि आदि। एसे में मुंशी प्रेमचन्द के ʺनमक के दारोगाʺ की कहानी याद आ जाना स्वाभाविक है।

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