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युनिफार्म वितरण में धांधली

Posted On 10 Sep, 2016 में

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सिंतंबर का महीना आधा बीतने को है। परिषदीय स्कूलों में अभी तक पूरी तरह से बच्चों को पुस्तके नहीं मिल पायी है। इतना ही नहीं ग्राम शिक्षा समितियों के खातों में युनिफार्म वितरण के लिए पहुंच चुकी धनराशि के वावजूद छात्राें युनिफार्म का वितरण नहीं हो रहा है। इसके पीछे कमीशनखोरी का वहीं पुराना खेल जो स्कूलों के प्रधानाध्यापकों ग्राम शिक्षा समितियाें और ग्राम प्रधानों तथा दुकानदारों के बीच खेला जाता है। उसमें इस वर्ष कुछ नये पैटर्न ने जगह बना ली है। अब यह खेल जिले के विभागीय उच्चाधिकारी और एक एनजीओं के बीच आ जाने से खेला जा रहा है।
अगर बात समझ में न आयी हो तो समझ लीजिए। गत वर्ष तक शासन के द्वारा जारी शासनादेश के अनुसार छात्रों में युनिफार्म का वितरण किया जाता था। इसमें दुकानदार लगायत प्रधानाध्यापक और ग्राम शिक्षा समितियों के सदस्यों के बीच एक ʺसमझʺ के अनुसार कमीशन तय होता था ओर छात्रों के बीच युनिफार्म का वितरण किया जाता था। इस कमीशन के तहत भले ही सरकार को करोडो का राजस्व का चूना जो बिक्रीकर के रूप में मिलता नहीं मिलता था। फिर भी यह काम येन केन प्रकारेण चलता रहता था। इस साल हमारे द्वारा उठाये शासन और जिले स्तर पर कमीशन बाजी के मामले के कारण अब यह मामला केन्दीयकृत हो गया है। और अब इस साल इस प्रकरण के एक ʺएनजीओʺ जिसका वीजिंटिग कार्ड नीचे अटैच है ‚ घुस गया है। यह एनजीओ लखनउ में पंजीकृत है और चुंकि उसे वाराणसी मे भी काम करना है इसलिए अपना कार्यालय गोरखपुर और वाराणसी में भी खोल लिया है।
बताया जाता है कि वाराणसी में गत महीने हमने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी वाराणसी और जिलाधिकारी वाराणसी समेत मुख्यमंत्री तक इस मामले को पहुंचाते हुये विगत पांच वर्षो के द्वारा बितरित की गयी युनिफार्म के लेखा जोखा और भुगतान की जांच की मांग की थी। हमने अपने उस पत्र का हवाला भी दिया था जिसमें वाराणसी जिले के कतिपय विद्‍यालयों के नाम बताते हुये उनके द्वारा वितरित की गयी युनिफार्म के आय व्यय का लेखा जोखा और उसकी भुगतान प्रकिया संंबंधी प्रशन उठाते हुये जांच की मांग की थी। इसके पश्चात कुछ जांच प्रकिया चल रही है। एसी हमे सूचना है। इसके बाद वाराणसी के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा समाचार पत्रों में एक सूचना सशुल्क प्रकाशित की गयी जिसमें कतिपय विंदुओं का उल्लेख करते हुये युनिफार्म वितरण का उल्लेख किया गया था। यह संभवतः कमीशन खोरी के खिलाफ उठाये गये कदम के रूप देखा गया था। लेकिन इसकी वास्तविकता तब सामने आयी जब कि उपरोक्त एनजीओं ने दबी जुबान पिण्डरा ब्लाक में अपनी ओर से प्रधानाध्यापको की एक बैठक में यह कहा कि इस साल वह युनिफार्म का वितरण करने जा रही है। और इसमें उसने अपने द्वारा वितरण की जा रही युनिफार्म में विगत सालों में वितरति की गयी युनीफार्म में अंतर को स्पष्ट किया। जैसे कि इस साल उसके द्वारा जो युनिफार्म वितरित की जायेगी उसके कालर पर एक नीले रंब की पट्टी लगी होगी और बांहों पर एक कप का निशान होगा। इतना ही नहीं उसके द्वारा यह भी कहा गया बताया गया है कि इसके साथ ही एक जोडी मोजा और एक जोडी स्वेटर भी दिया जायेगा। यहां हम बता दे कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत युनिफार्म वितरण क संबंध में जो शासनादेश जारी किया गया है उसमें इस प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है। ओर मोजा बांटने या स्वेटर देने की बात भी नहीं है। एनजीओं ने एसा सिर्फ अपने द्वारा वितरण किये जाने वाले युनिफार्म के अन्य वितरको से अलग दिखाने के कारण हुआ है।
अब आप अंदाजा लगा सकते है कि सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क 400-00 रूपये में दो जोडी युनिफार्म वितरण करने में एसा कैसे संभव हाेगा जब कि बिना रिकार्ड में आये लगभग 100-00 रूपये से लेकर 175-00 रूपये प्रधानध्यापकों ग्राम शिक्षा समितियों और शिक्षा विभाग कि अधिकारियेां तक कमीशन के रूप में चला जाता है। और फिर मोजा ओर स्वेटर को बांटने की बाध्यता न होने के वावजूद एनजीओं क्येां कर यह सब बांटने पर उतारू है। कहा गया है कि भवानी अपनी आंख नहीं देती। फिर यह एनजीओं किस बिना पर यह दान करने पर तुला हुआ है।
एनजीओं के बारे में कहा जा रहा है कि उसका संबंध सीधे सीधे जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी एवं बीआर सी के अधिकारी व कर्मचारी से है। और वह सीधे सीधे इन्हें कमीशन देकर इनके नाम पर युनिफार्म वितरण करेगा और इसकी कोई जांच भी नहीं की जायेगी। हां अन्य माध्यमों या सस्थाओं या वितरकों द्वारा वितरण करने पर संंबंधित विद्यालयों के खिलाफ ʺजांच की तहलवार ʺलटकायी जायेगी और उनमें तरह तरह की खोट निकाल कर उन्हें परेशान किया जायेगा।
एनजीओं और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के बीच के तारतम्य में प्रधानाध्यापकों को इसलिए भी विश्वास हो चला है कि गत महीने 13 अगस्त को पिण्डरा ब्लाक के बीआरसी पर यह कह कर एक बैठक बुलायी गयी थी कि इसमें जिला बेकिस शिक्षा अधिकारी आंयेगें और मीटिंग लेगें। लेकिन काफी इंतजार के बाद भी वे नहीं आये। और उनकी जगह पर आया एनजीओं का कार्यकर्ता और प्रभारी। प्रधानाध्यापकों में यह विश्वास बैठ गया कि अगर एनजीओं ओर बेकिस शिक्षा अधिकारी का तालमेल नहीं होता तो यह क्येां आता। इसमें एनजीओं ने अपने को उक्त अधिकारी द्वारा भेजा गया बताया गया। इस एनजीओं ने बाकायदा मीटिंग ली ओर अपने को एक मात्र संस्था के रूप में चिन्हित किया कि वहीं इस साल युनिफार्म का वितरण करेगी। यहां यह भी प्रशन उठता है कि अगर एनजीओं का तालमेल बेसिक शिक्षा अधिकारी से नहीं होता तो इसे मीटिंग की सूचना कैसे होती । वास्तव में यह सारी कवायद एनजीओ के लिए ही बुनी गयी थी। यह जांच का विषय हो सकता है कि क्या मीटिंग वास्तव में बेसिक ने ही बुलायी थी या फिर बीआसी स्तर से यह सब गुणा गणित किया गया था। सूचना है कि इस साल बीआरसी स्तर से भी कुछ प्रधानाध्यापकों को यह ज्मिमेदारी दी गयी है कि वे इस साल प्रति युनिफार्म 10-00 बीआर सी के लिए अलग से चार्ज करें।
इसी मीटिग के बाद वे लोग ओर प्रधानाध्यापक शांत बैठ गये जो एक दो दिन में युनिफार्म का वितरण करने वाले थे। और जिनके यहां दुकान दार अपने अपने कोटेशन के साथ पहुंचना प्रारंभ कर चुके थे। और कतिपय प्रधानाध्यापक अपने पुराने दुकानदार मंगारी बाजार स्थित एक रेडिमेड के दुकान पर अपने कमीशन के वावत बात करते नजर आते थे।
यहां यह बता दे कि जैसा कि उपर कहा गया है कि एनजीओं ने जो कालर पर नीले रंग की पट्टी की बात कह रहा है वहीं वास्तव में उसका निशान हाेगा जिससे यह सिद्ध होगा कि उक्त स्कूल में एनजीओं ने युनिफार्म वितरण किया है। अगर यह पटटी और बांह पर कप का निशान नहीं होगा तो यह सिद्ध हो जायेगा कि युनिफार्म एनजीओं ने नहीं बांटा है और फिर उसके खिलाफ तरह तरह की जांच की कार्यवाही की जायेगी।
दूसरी बात यह समझने की है कि अभी 400-00 रूपये में दो सीट कपडे बांटने में ही कमीशन के रूप में भारी धनराशि गंवानी पडती थी तो फिर इसमें मोजा और स्वेटर कैसे बांटा जायेगा और अगर बांटा भी जायेगा तो सभी कपडों की गुणवत्ता क्या होगी। क्या यह विभाग के शासनादेश के अनुकूल होगा। अगर नहीं तो यह सिद्ध है कि कमीशन के चलते इस संस्था के खिलाफ कोई जांच नही होगी। जैसा कि अभी तक भुगतान की प्रकिया के संंबध में मेरे द्वारा उठाये गये प्रश्नों का कोई आधिकारी जबाब देने की स्थिति में नहीं है।
यहां कहा जाता है कि स्वेटर के नाम पर युनिफार्म अभी तो बांट दिया जायेगा जब कि अभी जाडे का मौसम नहीं है और अभी स्वेटर की आवश्यकता भी नहीं है। जब जाडे का मौसम आयेगा तो यह एनजीअो भुगतान लेकर रफू चक्कर हो चुकी होगी। इस लिए अभी कोई प्रधानध्यापक सीधे अपने को जिम्मेदार न बनाते हुये वितरण का कार्य नहीे कर रहे हैं और ʺतेल और तेल की घार ʺ देख रहे हैं। इसप्रकार से एनजीअो और दुकानदारों के पाट के बीच में कमीशन आ जाने से बच्चे युनीफार्म से बंचित रह जा रहे हे।
सूचना मिल रही है कि अभी जो एक दो स्थानों पर इस एनजीओं ने युनिफर्म का वितरण किया है उसकी क्वालिटी सही नहीं हे। लेकिन सैया भये कोतवाल तो अब डर काहे का।
अतः सारा मामला कमीशन का है और कमीशन के चलते बेसिक शिक्षा विभाग की सारी मशीनरी फेल हो चुकी है। अब यह जिलाधिकारी महोदय का दायित्व है कि इस संपूर्ण प्रकरण की जांच कराये और कमीशन खोरी पर लगाम लगाये साथ ही एनजीओं के विषय में भी पूरी जांच कराये। ताकि बच्चोें काे समय से उच्च गुणवत्ता का युनिफार्म सरकार की मंशा के अनुरूप मिल सके।

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